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Showing posts from June, 2025

जोश (कविता)

जोश गहन अंधकार  अमावस की रात  अथक प्रयासरत खद्योत भर *जोश*  करते दीप्त नवाशा। बोझिल पलकें, उनींदे नेत्र चिंतामग्न वृद्ध काया सत्य समक्ष, संघर्षरत  जीवन चक्र अनवरत  काटी रात, समझा  अमावस-पूनो की माया। पौ फटी, लाली छायी चहके नभचर  तिमिर ओढ़े अवगुंठन  भर आँचल में तारक हरसिंगार  कर गलबहियाँ उषा की लहराया शीतल पवन खुला झरोखा  जगाये *जोश*  परे नैराश्य, हुआ नव प्रभात।  डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी' बैंगलुरू 🙏🙏✍️