भाव सेतु (लघुकथा) नीता शर्मा शैलेंद्र और शालिनी दोनों बहुत बैचेन से लग रहे थे। रेलवे स्टेशन के चारों तरफ अनगिनत अनजान चेहरों की भीड़ लेकिन सब अजनबी। पेरिस जैसे बड़े शहर में कोई उनकी बात समझ नहीं पा रहा था कि उन दोनों की ट्रेन छूट गई है और दोनों बुजुर्ग अपने "ट्रेवलिंग पैकेज" वाले साथियों से बिछड़ गए हैं। समझाते भी कैसे किसी को और किस भाषा में, उन्होंने तो कभी किसी भाषा का उपयोग किया ही नहीं था। मूक बधिर थे वे दोनों। इशारों की भाषा जानते और समझते थे बस। लेकिन इशारों की भाषा हर कोई नहीं समझता, तो कैसे समझाते अपनी करुण व्यथा एक अनजान देश के अनजान लोगों को। दोनों ने बहुत देर तक आते-जाते लोगों को अपनी बात इशारों में कहने की कोशिश की, पर न तो किसी के पास समय था और न उनके इशारों को समझने की काबिलियत। हताश होकर दुखी मन से दोनों प्लेटफार्म पर लगी एक बेंच पर जा बैठे। दूर खड़ा एक गोरा चिट्टा फ्रांसीसी युवा उनकी हर मुद्रा को बहुत गौर से देख रहा था। दोनों की स्थिति भांपते हुए उनके पास आ गया और 'शेक हैंड' करने की मुद्रा में उसने अपना हाथ शैलेन्द्र की ओर बढ़ा दिया। पति...