प्रस्तुत है पूर्वोत्तर के प्रतिष्ठित वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ अवधेश कुमार सिंह अवध जी की गज़ल गज़ल फूल सा खिलने लगा हूँ आजकल, फक्र से उड़ने लगा हूँ आजकल। खूँ - पसीने से कमाई जब किया, काम पर मरने लगा हूँ आजकल। जब निवाले को मिलाया भूख से, शान्ति से मिलने लगा हूँ आजकल। बेसहारों को उठाया प्यार से, प्यार को पढ़ने लगा हूँ आजकल। जब अहं को त्यागकर उनसे मिला, बर्फ - सा गलने लगा हूँ आजकल। अब न अपना या पराया है यहाँ, तोड़ हद बढ़ने लगा हूँ आजकल। जब अँधेरा देखता हूँ मैं कहीं, खुद ब खुद जलने लगा हूँ आजकल। लोग अपनाएँ मुझे या छोड़ दें, बेफ़िकर रहने लगा हूँ आजकल। राह अपनी खुद बनाकर मैं चला, शायरी कहने लगा हूँ आजकल। भीड़ या तनहाइयाँ हैं एक - सी, खुद से ...