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Showing posts from December, 2024

गज़ल

प्रस्तुत है  पूर्वोत्तर  के  प्रतिष्ठित वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ अवधेश कुमार सिंह अवध जी की गज़ल  गज़ल  फूल सा खिलने लगा हूँ आजकल, फक्र  से   उड़ने लगा हूँ आजकल। खूँ - पसीने  से  कमाई  जब किया, काम  पर  मरने लगा हूँ आजकल। जब  निवाले  को मिलाया भूख से, शान्ति से मिलने लगा हूँ आजकल। बेसहारों   को    उठाया    प्यार  से, प्यार  को  पढ़ने लगा हूँ आजकल। जब अहं को त्यागकर उनसे मिला, बर्फ - सा गलने लगा हूँ आजकल। अब  न  अपना  या  पराया है यहाँ, तोड़  हद  बढ़ने लगा हूँ आजकल। जब   अँधेरा   देखता   हूँ  मैं  कहीं, खुद ब खुद जलने लगा हूँ आजकल। लोग  अपनाएँ   मुझे  या  छोड़  दें, बेफ़िकर  रहने  लगा  हूँ आजकल। राह  अपनी  खुद  बनाकर मैं चला, शायरी  कहने   लगा  हूँ  आजकल। भीड़  या  तनहाइयाँ  हैं  एक - सी, खुद से ...

कविता - चाँद सी उम्र

काश उम्र भी चांद सी होती, हर पंद्रह दिन में घटती बढ़ती, पांच दिन का बचपन आता, निश्चल प्रेम और वात्सल्य रस पीती, अगले पांच दिन जंवा होती, हंसते हुए रम जाती सृजन और सम्मोहन में , पांच दिन ही बस हो परावलंबन , ढोती बोझ बुढ़ापे का, इस उम्मीद से,  कि फिर लौट आएगा बचपन, मिल जाएगा मातृ पितृ प्रेम, और हसीन सपनों से भरा मदमस्त यौवन, तब शायद मुझे ये जिंदगी, कभी बोझ न लगती। नीता शर्मा स्वतंत्र लेखन 

लघुकथा - बीजारोपण

बीजारोपण  एक भयंकर विस्फोट हुआ।   रोनित की आत्मा फुर्र ही गयी। उसने देखा कि उसकी दायें हाथ की पाँचों उँगलियाँ सामने खिड़की से चिपक गयीं। कलम की अग्नि में समिधा बन गयी, जिससे वह युद्धतंत्र के विरूद्ध निरन्तर लिख रहा था। वह चारण परम्परा से पूर्णतया असहमत था। कई बार वह बाल-बाल बचा पर बेखौफ़ था। फर्श रक्तरंजित और क्षत-विक्षत उसका तन था। बुत से बने लोग मृतकों के बीच उसके शरीर को ढूँढ रहे थे। यह देख रोनित की आत्मा हँस पड़ी क्योंकि  उसे मारने वाले भी उसे खोज रहे थे। रोनित शरीर से मुक्त हो चुका था पर विचार से नहीं। जाते-जाते उसने नयी फसल के लिए बीज बो दिया था। डा अनीता पंडा 'अन्वी'