काश उम्र भी चांद सी होती,
हर पंद्रह दिन में घटती बढ़ती,
पांच दिन का बचपन आता,
निश्चल प्रेम और वात्सल्य रस पीती,
अगले पांच दिन जंवा होती,
हंसते हुए रम जाती सृजन और सम्मोहन में ,
पांच दिन ही बस हो परावलंबन ,
ढोती बोझ बुढ़ापे का,
इस उम्मीद से,
कि फिर लौट आएगा बचपन,
मिल जाएगा मातृ पितृ प्रेम,
और हसीन सपनों से भरा मदमस्त यौवन,
तब शायद मुझे ये जिंदगी,
कभी बोझ न लगती।
नीता शर्मा
सर्वथा नवीन कल्पना। हार्दिक बधाई
ReplyDeleteमेरी रचना को स्थान देने हेतु आपको आभार और हृदय से धन्यवाद 🙏🙏💖💖
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