बीजारोपण
एक भयंकर विस्फोट हुआ। रोनित की आत्मा फुर्र ही गयी। उसने देखा कि उसकी दायें हाथ की पाँचों उँगलियाँ सामने खिड़की से चिपक गयीं। कलम की अग्नि में समिधा बन गयी, जिससे वह युद्धतंत्र के विरूद्ध निरन्तर लिख रहा था। वह चारण परम्परा से पूर्णतया असहमत था। कई बार वह बाल-बाल बचा पर बेखौफ़ था। फर्श रक्तरंजित और क्षत-विक्षत उसका तन था। बुत से बने लोग मृतकों के बीच उसके शरीर को ढूँढ रहे थे। यह देख रोनित की आत्मा हँस पड़ी क्योंकि उसे मारने वाले भी उसे खोज रहे थे। रोनित शरीर से मुक्त हो चुका था पर विचार से नहीं। जाते-जाते उसने नयी फसल के लिए बीज बो दिया था।डा अनीता पंडा 'अन्वी'
लेखिका डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी'
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