पढें लघुकथा "संस्कृति " (परम्परायें ही हमारी साँसें हैं।)

समीक्षा
लेखिका डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी"
एवं त्वरित समीक्षक गीता लिम्बू जी
लघुकथा
संस्कृति
शहर से गाँव में आयी मोहिनी ने चौपाल पर लोकगीत, ढोलक की थाप पर थिरकते बच्चे, जवान, बूढ़े देख खिलखिला कर हँस पड़ी। उसके पैर भी थिरकने लगे। उसने दादी से कहा,"दादी! दुनिया अब बहुत आगे बढ़ चुकी है। इनका कोई स्थान नहीं है।"
दादी गले लगाते हुए बोली,"है बिटिया! सबके साथ मिलकर खुल कर हँसना और दुख-सुख बाँटना।"
"सच दादी! आज महीनों बाद जी खोलकर हँसी हूँ। ये परम्पराएँ ही हमारी साँसें हैं।
सादर
🙏
डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी'
समीक्षा
परम्पराओं का जन्म शायद सौहार्द मिलन का उद्देश्य से ही हुआ था। ऐसा मिलन का आनन्द ही कुछ अलग ही होता है। "सच दादी! आज महीनों बाद जी खोलकर हूँ। ये परम्पराएँ हमारी साँसे है ।" अंत में शहर में पली मोहिनी ने भी परम्परा में शामिल होकर आनन्द अनुभव किया। महत्वपूर्ण संदेश देती सारगर्भित लघुकथा एवं सुन्दर प्रस्तुति। 👍👌
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