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Showing posts from October, 2025

हृदयगत भावनाओं को मूर्त रूप प्रदान करती नीता शर्मा जी का प्रथम काव्य संग्रह

हृदयगत भावनाओं को मूर्त रूप प्रदान करती नीता शर्मा जी का प्रथम काव्य संग्रह "भावों के दरीचे" *भावों के दरीचे*  साहित्याजंलि प्रकाशन, प्रयागराज से प्रकाशित नीता शर्मा जी का प्रथम काव्य संग्रह "भावों के दरीचे" (मूल्य 250/- मात्र) पर एक अवलोकन     कवि की सूक्ष्म दृष्टि एवं कल्पना शक्ति इतनी विस्तृत होती है कि वह सहज से दिखने वाले प्रत्येक पदार्थों, प्रकृति  तथा दृश्यों का इतना मनोहारी चित्रण करता है कि पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है। वह मन के भाव का सागर है, जिसमें प्रतिक्षण कल्पना, आशा एवं यथार्थ की असंख्य लहरें उठती-गिरती हैं। कवि जब इन भावों को शब्दों में पिरो लेता है, तो वह कविता का मूर्त रूप ले लेता है। ऐसे ही  शिलांग, मेघालय की कवि-हृदय नीता शर्मा जी ने  अपने भावों, कल्पना तथा यथार्थ को कविता के माध्यम से मूर्त रूप प्रदान  किया है। इन्होंने शब्दों को इन्द्रधनुषीय रंगों में रंगकर सहज काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है। अपनी कविता "शब्द क्या है?" में कहती हैं  - "वर्ण अक्षर मात्राओं ने शब्दों को जन्म दिया, शब्दों ने ही मिलकर भाष...

संस्कृति (लघुकथा)

पढें लघुकथा "संस्कृति " (परम्परायें ही हमारी साँसें हैं।) लेखिका डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी" एवं  त्वरित समीक्षक  गीता लिम्बू जी  लघुकथा  संस्कृति  शहर से गाँव में आयी मोहिनी ने चौपाल पर लोकगीत, ढोलक की थाप पर थिरकते बच्चे, जवान, बूढ़े देख खिलखिला कर हँस पड़ी। उसके पैर भी थिरकने लगे। उसने दादी से कहा,"दादी! दुनिया अब बहुत आगे बढ़ चुकी है। इनका कोई स्थान नहीं है।" दादी गले लगाते हुए बोली,"है बिटिया! सबके साथ मिलकर खुल कर हँसना और दुख-सुख बाँटना।" "सच दादी! आज महीनों बाद जी खोलकर हँसी हूँ। ये परम्पराएँ ही हमारी साँसें हैं। सादर   🙏 डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी' समीक्षा परम्पराओं का जन्म शायद सौहार्द मिलन का उद्देश्य से ही हुआ था। ऐसा मिलन का आनन्द ही कुछ अलग ही होता है। "सच दादी! आज महीनों बाद जी खोलकर हूँ। ये परम्पराएँ हमारी साँसे है ।" अंत में शहर में पली मोहिनी ने भी परम्परा में शामिल होकर आनन्द अनुभव किया। महत्वपूर्ण संदेश देती सारगर्भित लघुकथा एवं सुन्दर प्रस्तुति। 👍👌