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हृदयगत भावनाओं को मूर्त रूप प्रदान करती नीता शर्मा जी का प्रथम काव्य संग्रह

हृदयगत भावनाओं को मूर्त रूप प्रदान करती नीता शर्मा जी का प्रथम काव्य संग्रह "भावों के दरीचे"

*भावों के दरीचे* 
साहित्याजंलि प्रकाशन, प्रयागराज से प्रकाशित नीता शर्मा जी का प्रथम काव्य संग्रह "भावों के दरीचे" (मूल्य 250/- मात्र) पर एक अवलोकन 
  
कवि की सूक्ष्म दृष्टि एवं कल्पना शक्ति इतनी विस्तृत होती है कि वह सहज से दिखने वाले प्रत्येक पदार्थों, प्रकृति  तथा दृश्यों का इतना मनोहारी चित्रण करता है कि पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है।
वह मन के भाव का सागर है, जिसमें प्रतिक्षण कल्पना, आशा एवं यथार्थ की असंख्य लहरें उठती-गिरती हैं। कवि जब इन भावों को शब्दों में पिरो लेता है, तो वह कविता का मूर्त रूप ले लेता है। ऐसे ही  शिलांग, मेघालय की कवि-हृदय नीता शर्मा जी ने  अपने भावों, कल्पना तथा यथार्थ को कविता के माध्यम से मूर्त रूप प्रदान  किया है। इन्होंने शब्दों को इन्द्रधनुषीय रंगों में रंगकर सहज काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है। अपनी कविता "शब्द क्या है?" में कहती हैं  -
"वर्ण अक्षर मात्राओं ने शब्दों को जन्म दिया,
शब्दों ने ही मिलकर भाषा को सार्थक रूप दिया।"
    कवयित्री का काव्य संग्रह  "भावों के दरीचे" में पारिवारिक संबध, आध्यात्म से लेकर प्रकृति, समाज, देश, समसामयिक, प्रेम एवं मुक्त छन्द आदि का सुन्दर समायोजन मिलता है। वे यथार्थ की पृष्ठभूमि में शब्द चुनती हैं और विपरीत परिस्थितियों में पराजित मन को हौसला देती हैं। कठोर परिश्रम के उपरांत मिली निराशा में भी संघर्षरत हो आशा का दीप जलाये रहती हैं  -
रे मन! मत हार तू,
उठ, खड़ा हो संघर्ष कर
त्याग निराशा
कर दूर दृष्टि का सामना 
कहीं दूर खड़ी आशा 
तेरी बाट जोहती। 
       कविता -  रे मन! मत हार तू
नीताजी की रचनाओं में भाव प्रवणता है। वे बड़ी ही सहजता  से गंभीर विषय को सबके समक्ष प्रस्तुत करती है। संसार से इतर स्व का अनुसंधान उन्हें  बोधिसत्व की प्राप्ति करता है पर माया रूपी जाल में आबद्ध अपनी व्याकुलता प्रकट करते हुये कहती हैं  -
द्वंद्व द्वंद्व अंतर मन 
हृदय का स्पंदन 
करें क्रंदन 
बुद्ध ना बन पाऊं 
कैसे त्याग सब जाऊँ? 
चाहूँ मौन
 ना जानूँ कौन?
              कविता  - द्वंद्व
कवयित्री मात्र आत्म-मंथन में संलग्न   नहीं है अपितु प्रकृति के लगातार दोहन से द्रवित भी है। इनकी व्यथा कविता "बरगद की व्यथा" में व्यक्त होती है -

गाँव का पुराना एक बरगद हूँ मैं,
मात्र पेड़ नहीं, वर्षों के तजुर्बे लिए,
गांव का बुजुर्ग हूं मैं।
हर खुशी और गम में शामिल,
सबके साथ हंसता और रोता,
बिना किसी आशा, अपेक्षा से,
हरदम ठंडी छांव देता।
×      x       x       x
काट मेरे अंग घाव तुम देते रहे,
देता था जीवनदान मैं,
प्राण तुम लेते रहे।

आज आधुनिकता की दौड़ में रिश्तों की डोर छूटती जा रही है। संबंधों की प्रगाढ़ता औपचारिकता बनती जा रही है। ऐसे में कवयित्री माता-पिता के वात्सल्य प्रेम से स्नेहसिक्त कर देती है। मायके से विदा होती बेटी से माँ पूछती है  - 

मायके से निकालते माँ ने पूछा था
 बिटिया सब ले लिया ना
 कुछ छूटा तो नहीं
 मैं हँस दी/ बोली - ज्यादा कुछ नहीं 
छूटा है बस,/ मेरा बचपन/
 मेरी जिद/ तुम्हारी झिड़कियाँ पापा का लाड़......
 
इतना ही नहीं कवयित्री की सौन्दर्य दृष्टि उड़ती पतंग पर पड़ती है। जिसे अल्हड़ नवयुवती के प्रतीक के रूप में चित्रित कर मानव-मन की असीम आकांक्षाओं दर्शाया है। ध्यातव्य है इनकी "पतंग" कविता की ये पंक्तियाँ  - 

 
अल्हड़ नवयुवती-सी देखो, सी देखो 
पतंग डोलती इधर उधर,
इतराती, बलखाती,
मौज उड़ाती हो बेखबर।
बेशुमार चाहतों की डोर से बंधी,
उड़ती रहती स्वछंद होकर,
बादलों को चूमती,
हवा से बातें करती,
अठखेलियाँ करती वो नभ पर।

कवयित्री की काव्य-संसार में राष्ट्रवादी स्वर मुखरित हुआ है। उन्हें राजभाषा हिन्दी से प्रेम है। वे राष्ट्रीय  एवं सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी हैं। राष्ट्र-प्रेम इनकी कविताओं में कूट-कूट कर भरा है। वे संगठन-शक्ति को राष्ट्र का आधार-स्तम्भ मानती है। इनके अनुसार  -

हे राष्ट्रप्रेमी! उठ, जाग,
भारत माँ पुकार रही,
छाया है तम घोर,
चारों ओर,
×      x        x      x
तुझे ही ये मशाल जलाना है,
लेकर सबको साथ,
अपने राष्ट्र को, 
इस प्यारे भारतदेश को,
विश्व गुरु बनाना है।

इनकी रचनाओं में जीवन के विविध आयाम,  नारी-विमर्श, सौन्दर्य एवं   दैनिक जीवन की गतिविधियाँ, संबंधों की मिठास के साथ-साथ अंतर्मन की व्यथा भी समाहित है। देश, काल, परिस्थितियों और अनुभव  के आधार पर वे शब्दों का रूप लेती हैं। बैखरी बन कविताओं में ढल जाती हैं। नीता शर्मा जी का प्रथम  काव्य-संग्रह "भावों के दरीचे'' काव्य प्रेमियों के हृदय में स्थान बनाने में सफल होगी। चरैवति! 

डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी'
वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद्

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