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गज़ल

प्रस्तुत है  पूर्वोत्तर  के  प्रतिष्ठित वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ अवधेश कुमार सिंह अवध जी की गज़ल 

गज़ल 

फूल सा खिलने लगा हूँ आजकल,
फक्र  से   उड़ने लगा हूँ आजकल।

खूँ - पसीने  से  कमाई  जब किया,
काम  पर  मरने लगा हूँ आजकल।

जब  निवाले  को मिलाया भूख से,
शान्ति से मिलने लगा हूँ आजकल।

बेसहारों   को    उठाया    प्यार  से,
प्यार  को  पढ़ने लगा हूँ आजकल।

जब अहं को त्यागकर उनसे मिला,
बर्फ - सा गलने लगा हूँ आजकल।

अब  न  अपना  या  पराया है यहाँ,
तोड़  हद  बढ़ने लगा हूँ आजकल।

जब   अँधेरा   देखता   हूँ  मैं  कहीं,
खुद ब खुद जलने लगा हूँ आजकल।

लोग  अपनाएँ   मुझे  या  छोड़  दें,
बेफ़िकर  रहने  लगा  हूँ आजकल।

राह  अपनी  खुद  बनाकर मैं चला,
शायरी  कहने   लगा  हूँ  आजकल।

भीड़  या  तनहाइयाँ  हैं  एक - सी,
खुद से खुद मिलने लगा हूँ आजकल।

मैं  तुझे  कैसे   बताऊँ   क्या  हुआ,
आग  पर चलने लगा हूँ आजकल।

आँधियों  को  मात  दे  रौशन हुआ,
रात  को  खलने लगा हूँ आजकल।

तोड़   माया   की  दिवारें  शून्य  में,
राम  को  भजने लगा हूँ आजकल।

जंग  में  पाया  नहीं, खोया   बहुत,
हाथ  को  मलने लगा हूँ आजकल।

छोड़ नफरत को अदावत को अवध,
आदमी  बनने  लगा  हूँ  आजकल।

डा अवधेश कुमार सिंह अवध 
वरिष्ठ साहित्यकार (साहित्य  की हर विधा में पारंगत) सैकड़ों राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित, प्रतिदिन राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन मेघालय में सहभागिता आदि

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