भाव सेतु (लघुकथा)
शैलेंद्र और शालिनी दोनों बहुत बैचेन से लग रहे थे। रेलवे स्टेशन के चारों तरफ अनगिनत अनजान चेहरों की भीड़ लेकिन सब अजनबी। पेरिस जैसे बड़े शहर में कोई उनकी बात समझ नहीं पा रहा था कि उन दोनों की ट्रेन छूट गई है और दोनों बुजुर्ग अपने "ट्रेवलिंग पैकेज" वाले साथियों से बिछड़ गए हैं। समझाते भी कैसे किसी को और किस भाषा में, उन्होंने तो कभी किसी भाषा का उपयोग किया ही नहीं था। मूक बधिर थे वे दोनों। इशारों की भाषा जानते और समझते थे बस। लेकिन इशारों की भाषा हर कोई नहीं समझता, तो कैसे समझाते अपनी करुण व्यथा एक अनजान देश के अनजान लोगों को। दोनों ने बहुत देर तक आते-जाते लोगों को अपनी बात इशारों में कहने की कोशिश की, पर न तो किसी के पास समय था और न उनके इशारों को समझने की काबिलियत। हताश होकर दुखी मन से दोनों प्लेटफार्म पर लगी एक बेंच पर जा बैठे।
दूर खड़ा एक गोरा चिट्टा फ्रांसीसी युवा उनकी हर मुद्रा को बहुत गौर से देख रहा था। दोनों की स्थिति भांपते हुए उनके पास आ गया और 'शेक हैंड' करने की मुद्रा में उसने अपना हाथ शैलेन्द्र की ओर बढ़ा दिया। पति-पत्नी उसे देख थोड़ा असहज हो गए और शंका भरी आंखों से एक दूसरे की तरफ देखने लगे। थोड़ी हिम्मत जुटा शैलेंद्र ने खुद को सहज करते हुए मायूसी भरी मुस्कान बिखेर दी और फिर हिचकते हुए अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया। साथ ही मूक बधिर होने का इशारा भी कर दिया। मुस्कुराते हुए वह अजनबी युवक वही बेंच पर उनके पास बैठ गया। बड़ी आत्मीयता से शैलेंद्र और शालिनी के हाथों को अपने हाथों में ले इशारों से समझाया कि वह भी मूक बधिर है और उनकी बात समझ गया है। इस बात का पता चलते ही दोनों के चेहरे खुशी से ऐसे खिल उठे जैसे भीड़ में खोए बच्चे को मां मिल गई हो।
बस फिर क्या था!
कुछ ही पलों में दो अजनबी देशों के वाशिंदे भीड़ से बेखबर हंसते हुए इशारों इशारों की दुनिया में पहुंच गए और अनजान देश के अजनबी चेहरों के सागर में भाषा ज्ञान के अभाव के बावजूद, भाव, सेतु बन गए थे।
नीता शर्मा
शिलांग, मेघालय
nitasharma.writer@gmail.com
# त्वरित समीक्षा#
गीता लिम्बू
भाव सेतु
अजनबी देश के अजनबी शहर पेरिस के रेलवे प्लैटफॉर्म में ट्रेन छूट जाने कारण और ट्रेवलिंग पैकेज
वाले साथियों से छूट जाने के बाद मूक बधिर बुजुर्ग दम्पति शैलेंद्र और शालिनी की असहाय दयनीय अवस्था को अपने में व्यस्त लोगों में से किसी ने समझ नहीं पाया न समझने की कोशिश की सिवा एक फ्रांसीसी युवक जो खुद मूक-बधिर है। फिर उनमें भावों का आदान-प्रदान हुआ। भावों का एक सेतु बना और उन्हें क्षण भर में मित्र बना दिया और हँस- हँस कर इशारों में बातें करने लगे। शैलेंद्र और शालिनी कुछ देर के लिए भूल जाते हैं कि वे अजनबी देश के अजनबी शहर में हैं।
यह लघु कथा अपनों के सान्निध्य और प्रेम से वंचित एकाकी जीवन बिता रहे शारीरिक एवं मानसिक रूप से दुर्बल हो चुके बुजुर्गों के प्रति सहानुभूति की दृष्टि रखती है।
आधुनिक युग में एकल परिवार की चाहत में या रोजगार के निमित्त या कर्म सूत्र के निमित्त बुजुर्ग माता-पिता को नि:सहाय छोड़ कर लोग एकल परिवार में रहते हैं। कोई लोग विदेश में रहते हैं। थोड़ा सा प्यार और अपनापन की तृष्णा और थोड़ी सी उम्मीद लेकर बुजुर्ग अपनों की खोज में चल पड़ते हैं, भटकते फिरते हैं ।
पेरिस के रेलवे स्टेशन में भटकते मूक-बधिर बुजुर्ग दम्पति शैलेंद्र और शालिनी की दयनीय स्थिति यही समस्या का आभास देती है।
यह कहानी शून्य प्रायः होती जा रही मानवीय संवेदनशीलता पर कटाक्ष करती है। वरिष्ठ कथाकार नीता शर्मा ने बड़ी कुशलता से हिंदी के प्रचलित कहावत"जाके पाँव ना फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई" को अंतर्निहित कर दिया है।
संक्षिप्त, संघर्ष, सीमित पात्र, एकाग्रता (एकांगी), प्रभावशाली भाव, उत्सुकता, आधुनिक लघुकथा के ये सभी लक्षण "भाव-सेतु में विद्यमान हैं।
करीबन तीन सौ इक्यासी शब्दों में लिखी गई संक्षिप्त कथा में कुल तीन ही पात्र हैं। कथा की शुरुआत पृष्ठभूमि पेरिस के रेलवे प्लेटफॉर्म से होती है और उसी जगह पर समाप्त हो होती है।
एक मूक-बधिर दम्पति बहुत देर तक अपनी समस्या आते-जाते लोगों को समझाने का असफल प्रयास (संघर्ष) करती है। वे थक हार कर प्लेटफाॅर्म में लगे एक बेंच पर बैठ जाते हैं।
इसमें अत्यन्त मर्मस्पर्शी दृश्य उकेरा गया है। इस दृश्य पाठक के हृदय में बुजुर्ग दम्पति के प्रति करुणा से भर देता है।
घटनाक्रम आगे बढ़ता है। संवेदनहीन भीड़ में से निकले एक फ्रांसीसी मूक बधिर युवक आगे बढ़ कर उन्हें सौहार्द्र का हाथ आगे बढ़ाता है। उसकी सहृदयता पाठक के मन में गहरा प्रभाव छोड़ती है और अंधेरे में जुगनू की रोशनी की तरह उम्मीद जगाती हुई सुखद संदेश देती है कि संसार में अब भी मानवता
जिंदा है। शीर्षक से लेकर अन्त तक कुतूहल से भरी है कहानी।
शीर्षक "भाव सेतु" पढ़ते ही जिज्ञासा जागृत होती है "किन लोगों के भावों का सेतु?"
" दो प्रेमियों के? "
"मित्रों के?", "शिशु और माता के?
या "मूक बधिरों के?"
"क्या यह भाव का सेतु इंसान और इंसान
के बीच का है या जानवर और इंसान के बीच बना भाव सेतु है ?"
फिर कहानी की शुरुआत में पाठक के मन में यह जिज्ञासा जागृत होती है, "सुदूर फ्रांस के पेरिस शहर में मूक-बधिर शैलेंद्र और शालिनी क्यों गए?"
"क्या उनकी मदद कोई नहीं करेगा?"
जब कोई मददगार नहीं निकला और वे थक-हार कर बेंच में बैठ गए तब यह जिज्ञासा जागृत होती है,"अब ये क्या करेंगे?"
फ्रांसीसी युवक से मित्रता होने के बाद प्रश्न उठता है " क्या इस युवक ने दोनों बुजुर्ग को उनके लक्ष्य तक पहुँचाने का आश्वासन दिया या यूं ही कुछ देर के लिए मनोरंजन कर रहा है?" क्या युवक उन्हें लक्ष्य तक पहुँचाने में सफल होगा?"
"तीनों किस बात पर हँस रहे है?"
पाठक को ऐसी उत्सुकता में छोड़कर कहानी समाप्त किया जाता है।
यद्यपि कथा में अक्षमता, एकाकी जीवन, संवेदनहीनता का आभास मिलता है परन्तु "भाव सेतु" शीर्षक द्वारा निर्देशित केंद्रीय भाव को हम इस तरह समझ सकते हैं,
जिस तरह लिखित या मौखिक भाषा को दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य विचारों के आदान प्रदान का सेतु कहा जाता है ; उसी तरह प्रदर्शित हाव-भाव भी सांकेतिक भाषा है और इसे भाव का सेतु अर्थात "भाव सेतु" कहा जा सकता है।
सहानुभूति और सदेच्छा रखकर प्रयास करें तो मूक भाषा सभी लोग समझ सकते हैं । हाव-भाव देखकर जानवर की भाषा भी हम समझते हैं।
कथा में तीन मूक-बधिरों के वार्तालाप में उनकी मूक बधिरता बाधा नहीं बनती। वे तीनों हँस-हँस कर बातें कर रहे होते। उनके वार्तालाप में शब्द मुखर नहीं हैं पर वे एक-दूसरे को समझ रहे हैं और समझा पा रहे हैं। उनके वार्तालाप में बातों को एक दूसरे तक पहुँचाने में उनके भाव ही सेतु बन गए हैं।
यहीं कथा का केंद्रीय भाव स्पष्ट होता है और शीर्षक को सार्थक करता है।
"भाव सेतु" की सरल, सौष्ठव भाषा, घटनाक्रम की गति पाठकों को अंत तक बाँधकर रखती है।
गीता लिम्बू
शिलांग 6 ,मेघालय
्
बहुत बहुत धन्यवाद आपका 🙏🙏❤️
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