जोश
गहन अंधकार
अमावस की रात
अथक प्रयासरत खद्योत
भर *जोश*
करते दीप्त नवाशा।
बोझिल पलकें, उनींदे नेत्र
चिंतामग्न वृद्ध काया
सत्य समक्ष, संघर्षरत
जीवन चक्र अनवरत
काटी रात, समझा
अमावस-पूनो की माया।
पौ फटी, लाली छायी
चहके नभचर
तिमिर ओढ़े अवगुंठन
भर आँचल में तारक हरसिंगार
कर गलबहियाँ उषा की
लहराया शीतल पवन
खुला झरोखा
जगाये *जोश*
परे नैराश्य, हुआ नव प्रभात।
डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी'
बैंगलुरू 🙏🙏✍️
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