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लघु कवितायेँ - चाँदनी एवं विरहणी का बसंत समीक्षा सहित। रचनाकार - अनीता पंडा अन्वी एवं समीक्षक - नलिनी श्रीवास्तव



चाँदनी 
विधा - लघुकविता(10 पंक्तियाँ)

निहारता चाँद सोलह कलाओं संग
बिछा दूधिया चादर, 
बरसा रहा अमृत बूँदें 
फुसफुसाया, मुस्कुराया
कैसा प्रश्न, कैसी दुविधा 
झाँक कर देखो प्रिय!
अंतरतम 
उठो, जागो और जगाओ 
अपनी आत्मा 
चमकृत हो रहा चाँदनी सम।
अनीता पंडा अन्वी

*विरहणी का बसंत* 

दस्तक दे रहा मधुमास 
हुई आहट,जागी आस
पर आँगन में बिखरे 
सूखे पत्ते पतझड़ के 
बटोरती, पुनः लौट आते
गीत गाते विरह-वेदना के
नहीं सुनते कोयल के गीत
चरमराते, पुकारते खोये मीत 
चले जाओ, आगंतुक बसंत 
 चिर-प्रतिक्षित विरहित कंत।

अनीता पंडा अन्वी

समीक्षक
नलिनी श्रीवास्तव  

 चाँदनी 
बहुत गहराई लिए यह कविता है।
यह रूहानियत या अध्यात्म से परिपूर्ण कविता है।
एक दृष्टि से देखा जाए तो पूनम के चाँद की सोलह कलाओं से भरपूर होने की बात की गई है, जिसकी अनेक खूबियों और सौन्दर्य से दुनिया परिचित है। 
दूसरी तरफ़ आत्मा के जागृत करने बात लगती है, अन्तरमन की आन्तरिक चेतना को जगाकर आन्तरिक यात्रा कर उस चाँद के अनुपम सौंदर्य, अद्भुत रौशनी को देखने और अनुभव करने के लिए लेखक ने इशारा दिया है। 🙏

विरहणी  का बसंत 
बहुत ही सुन्दर और मर्मस्पर्शी भाव पिरोए हैं इन पंक्तियों में … 
पतझड़ भी गुहार कर रहे  अपने कंत, प्रीतम और ऋतुराज की।अपने वीराने और सूखे जीवन में कोयल की मीठी आवाज़ लिए वे आयें और कुसुमित सौरभ बिखरायें। 
अंतस् का बसन्त निखर कर आए। 


Comments

  1. इतनी सूक्ष्म समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय नलिनी जी

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